देखिए इस वीडियो को… और खुद फैसला कीजिए
ये कुदरत का कहर है या उस सिस्टम की नाकामी, जिसने इंसान को मरने के बाद भी इज़्ज़त से विदा होने का हक़ नहीं दिया। तस्वीरें हैं मध्यप्रदेश के दतिया जिले के मुरिया गांव की, जहां एक महिला की मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार, परिजनों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। तेज़ बारिश शुरू हो गई… लकड़ियां भीग गईं… चिता सुलग ही नहीं पाई। अंत में चिता को तिरपाल से ढका गया… और फिर भीगते हुए, कांपते हुए, तूफान का सामना करते हुए परिजन अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करते रहे.
क्या यही है इंसान की आखिरी इज़्ज़त? क्या ऐसा दृश्य किसी समाज की तस्वीर होना चाहिए ? गांव में कोई मुक्ति धाम नहीं है। ग्रामीणों का कहना है — उन्होंने प्रशासन से कई बार गुहार लगाई, पर हर बार सिर्फ वादे मिले। नतीजा — अंतिम विदाई भी अब सम्मान के बजाय संघर्ष बन गई है।
ये सिर्फ मुरिया गांव की कहानी नहीं है — ये उस सुस्त व्यवस्था की पहचान है जो योजनाएं तो बनाती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इंसान की इंसानियत तक भूल जाती है।
इस परिवार ने सिर्फ एक अपनों को नहीं खोया — बल्कि उसके अंतिम संस्कार की गरिमा को भी खो दिया। सोचिए, क्या गुज़र रही होगी उन पर, जो भीगते हुए उस चिता के इर्द-गिर्द खड़े थे…
आप बताइए— दोषी कौन है? वो बारिश, जो लगातार बरसती रही… या वो व्यवस्था, जो सालों से इंसानियत के नाम पर सूखी पड़ी है










