विनय कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
संगठन और सरकार के बीच कैसे बनाएंगे तालमेल
कुर्सी मिल गई… कमान मिल गई… लेकिन रास्ता आसान नहीं
सुक्खू गुट और वीरभद्र गुट के बीच की खाई को कैसे करेंगे पार
पंचायत चुनाव में कांग्रेस कमजोर पड़ी तो 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा सीधा असर
हिमाचल कांग्रेस को अध्यक्ष तो मिल गया है लेकिन इस कुर्सी पर बैठना आसान नहीं है …. ये तस्वीरें देखिए … जब विनय कुमार ने पदभार ग्रहण किया तो राजीव भवन में खूब तालियां बजीं …फूल, मालाएँ पहनाई गईं…. गले मिलकर बधाइयां दीं गईं….. ऐसा लग रहा था जैसे कांग्रेस एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रही है ! लेकिन सच ये है… ये सारी मुस्कुराहटें सिर्फ़ कैमरे तक हैं… क्योंकि जिस कुर्सी पर विनय कुमार आज बैठे हैं… वो कुर्सी फुलों की नहीं… बल्कि काँटों और बारूद की बनी हुई है ! भले ही बड़ी जिम्मेदारी पाकर विनय कुमार सुर्खियों में आ गए हैं लेकिन उनके सामने ऐसी चुनौतियां हैं जिसकी आग उनके अंदर अभी से ही धधक रही है…. और अगर विनय कुमार इन चुनौतियों पर काबू नहीं पा सके… तो ये पूरा “एकता वाला फोटोशूट” सिर्फ फोटोशूट ही रह जाएगा …. खबर का एंगल बिल्कुल साफ़ है – विनय कुमार प्रदेश अध्यक्ष तो बन गए… लेकिन असली सवाल ये है – क्या वो चुनौतियों का समाधान कर पाएंगे या नहीं हिमाचल कांग्रेस पहले से ही दो बड़े गुटों में बंटी रही है… एक तरफ़ सीएम सुक्खू का गुट… दूसरी तरफ़ दिवंगत वीरभद्र सिंह का पुराना कुनबा।
तो ऐसे में विनय कुमार के सामने चुनौती नंबर-1 है गुटबाजी को पार्टी पर हावी होने से रोकना …. राजा वीरभद्र सिंह के जाने के बाद सभी ने सोचा था कि वीरभद्र गुट कमजोर पड़ जाएगा … लेकिन ऐसा नहीं हुआ … वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह पूरी तरह एक्टिव हैं और साथ ही मंत्री विक्रमादित्य सिंह बखूबी काम कर रहे हैं … हां ये सच है कि प्रतिभा सिंह अब अध्यक्ष नहीं रहीं, लेकिन उनका असर बाकी है। विनय कुमार खुद कभी वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी थे… विक्रमादित्य सिंह ने तो हाल ही में कहा भी कि “उनके पिता यानी स्वर्गीय वीरभद्र सिंह ने ही विनय कुमार को राजनीति सिखाई”। अब सवाल ये है… क्या विनय पुराने आका के गुट और मौजूदा सीएम के बीच सेतु बन पाएंगे… या फिर गुटबाजी फिर सिर उठाएगी?
विनय कुमार के सामने चुनौती नंबर-2 रहेगी सरकार और संगठन में तालमेल — पिछले तीन साल में संगठन और सरकार में 36 का आंकड़ा रहा।
प्रतिभा सिंह बार-बार चिल्लाती रहीं – “हमारे लोगों को बोर्ड-निगमों में जगह दो”… लेकिन सुना किसी ने नहीं। अब विनय कुमार ने खुद कहा है – “मैं सरकार और संगठन के बीच कड़ी का काम करूँगा”। लेकिन क्या सीएम सुक्खू इसके लिए तैयार होंगे? ये बड़ा सवाल है।
चुनौती नंबर-3 की अगर बात करें तो निष्क्रिय संगठन को खड़ा करना — पिछले एक साल से प्रदेश कांग्रेस का संगठन भंग पड़ा है… बूथ लेवल तक कोई ढाँचा नहीं। विनय कुमार ने खुद माना – “जिला से बूथ तक कार्यकारिणी बनाना सबसे बड़ी चुनौती है”। और प्रतिभा सिंह ने साफ़ कह दिया – 35-40 पुराने वफादार कार्यकर्ताओं को एडजस्ट करना पड़ेगा। यानी पुराने योद्धाओं को नाराज़ नहीं करना… और नए चेहरों को मौका भी देना… ये जादूगर का खेल होगा। जो विनय कुमार के सामने काफी चुनौतीपूर्ण रहेगा .
अगली चुनौती की बात करें तो वो है दलित कार्ड और सामाजिक समीकरण — हिमाचल में हाल ही में दलित उत्पीड़न के कई मामले सुर्खियों में रहे। विनय कुमार खुद SC समुदाय से आते हैं। उनकी ताजपोशी को पार्टी दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति भी बता रही है। अब देखना ये है कि क्या विनय इस भावनात्मक मुद्दे को वाकई मजबूती से उठा पाते हैं।
वहीं सबसे बड़ी चुनौती है पंचायत चुनाव …पंचायत चुनाव दहलीज पर हैं ….कांग्रेस अगर यहाँ कमजोर पड़ी… तो 2027 के विधानसभा चुनाव पर सीधा असर पड़ेगा। विनय कुमार को न सिर्फ़ संगठन खड़ा करना है…बल्कि जीत भी दर्ज करानी है। तो कुल मिलाकर… विनय कुमार के लिए ये कुर्सी गुलाबों का बिस्तर नहीं… काँटों की सेज ज्यादा है। एक तरफ़ गुटबाजी सुलग रही है… दूसरी तरफ़ सरकार-संगठन में खाई… ऊपर से पंचायत चुनाव का दबाव। सवाल सिर्फ़ ये है – क्या विनय कुमार वो जादुई गोंद बन पाएँगे… जो हिमाचल कांग्रेस के टूटते टुकड़ों को जोड़ दे? या फिर पुराना इतिहास दोहराया जाएगा? समय बताएगा… लेकिन फिलहाल राजीव भवन में जो जोश दिखा… वो जोश अगर जमीन पर उतरा… तो हिमाचल में कांग्रेस मजबूत बन सकती है .,..खैर आपका क्या मानना है अपनी राय जरूर दीजिएगा










