shimla : मकर संक्रांति का पावन पर्व सनातन परंपरा में सूर्य के उत्तरायण होने का महान उत्सव माना जाता है। इसी पवित्र अवसर पर हिमाचल प्रदेश की ऋषि जमदग्नि की तपोभूमि तत्तापानी में श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। मान्यता है कि इस दिन यहां के प्राकृतिक गर्म जल कुंडों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
इस वर्ष भी सर्दियों की कड़ाके की ठंड और हाड़ कंपा देने वाली हवाओं के बीच सुबह ब्रह्म मुहूर्त से श्रद्धालुओं का तांता लगा। शिमला से लगभग 56 किलोमीटर दूर सतलुज नदी के किनारे बसे इस पवित्र स्थल पर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सभी गर्म पानी के कुंडों में स्नान कर पुण्य की कामना कर रहे थे। स्थानीय भाषा में ‘तत्तापानी’ का अर्थ होता है “तपा हुआ या गर्म पानी”, और मान्यता है कि मकर संक्रांति या लोहड़ी के दिन यहां स्नान करने से न केवल पुण्य मिलता है, बल्कि चर्म रोगों से भी मुक्ति होती है।
स्नान के बाद श्रद्धालु तुलादान और दान के विधान का पालन करते हैं। तत्तापानी की सबसे खास परंपराओं में से एक है खिचड़ी का प्रसाद, जिसकी परंपरा लगभग 97 वर्षों से पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जा रही है। इस वर्ष भी लगभग 3 क्विंटल खिचड़ी श्रद्धालुओं को वितरित की गई। इतना ही नहीं, तत्तापानी का यह अनोखा पर्व गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। वर्ष 2020 में विशाल पतीले में खिचड़ी बनाकर दुनिया का ध्यान खींचा गया था।
इतिहास और पौराणिकता की बात करें तो तत्तापानी का यह स्थल त्रेता युग से जुड़ा माना जाता है। महर्षि जमदग्नि ने अपनी पत्नी रेणुका और पुत्र भगवान परशुराम के साथ यहीं तपस्या की थी। किंवदंतियों के अनुसार आज भी यह भूमि भगवान परशुराम की तपोस्थली रही है, जहां धार्मिक ऊर्जा का अनुभव हर श्रद्धालु महसूस कर सकता है।
आस्था के साथ-साथ तत्तापानी भू-वैज्ञानिक दृष्टि से भी विशेष है। यहां के पानी में गंधक की मात्रा अधिक होने के कारण यह त्वचा संबंधी रोगों में लाभकारी माना जाता है। वर्ष 2013 में कोल डैम बनने के बाद पुराना स्रोत डूब गया था, लेकिन जियोलॉजिकल विभाग की ड्रिलिंग से नदी किनारे फिर से गर्म पानी का स्रोत खोजा गया। आज श्रद्धालुओं के लिए पक्के कुंड तैयार हैं, जहां सर्दियों में भी पानी और वातावरण स्वाभाविक रूप से गर्म रहता है।
बर्फीली ठंड और हाड़ कंपा देने वाली हवाओं के बीच भी तत्तापानी में श्रद्धालुओं की आस्था की गर्माहट ने सबको प्रभावित किया। यह स्थल सिर्फ स्नान का स्थान नहीं है, बल्कि त्रेता युग की गूंज, 97 साल पुरानी परंपराएं और अटूट श्रद्धा का संगम है।
इसलिए, हिमाचल का तत्तापानी सिर्फ पर्वस्थल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और प्रकृति का अद्भुत संगम बन जाता है, जहां हर श्रद्धालु अपने जीवन को पुण्य और शांति से भरने के लिए इस पवित्र जल में डुबकी लगाता है।










