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कंधों पर लदी उम्मीदें: शाहपुर में आज़ादी तो आई… पर सड़क अब भी रास्ते में है!”

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आज़ादी के 75 साल बाद भी… कंधों पर लादनी पड़ती है ज़िंदगी!”

“शाहपुर के गांवों में अब भी नहीं पहुंची सड़क, सिर्फ वादे पहुँचे हैं”

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“बीमार हो या प्रेग्नेंट… हर हालत में चढ़ाई तय करनी पड़ती है”

“विधायक केवल सिंह पठानिया आए, देखा, वादा किया… और चले गए”

“जनता कंधे पर मरीज उठाए चल रही है, नेता विकास का बोझ उठाने से कतरा रहे हैं”

“सरकारों से सीधा सवाल: वोट चाहिए या ज़िंदगी की सुविधा?”

हर कदम पर कांपते हैं पांव, सांसें उखड़ती हैं, लेकिन रुकना मना है —
क्योंकि सवाल जान बचाने का है।

ये तस्वीरें 1947 की नहीं हैं…
ये आज़ाद भारत के उसी हिमाचल की हैं, जहां विकास हर भाषण में झलकता है… लेकिन हकीकत इन गांवों की कुछ और ही कहानी कहती है।
शाहपुर विधानसभा क्षेत्र…
विधायक हैं केवल सिंह पठानिया…
जिन्होंने हर मंच से विकास का दावा किया,
लेकिन इन तस्वीरों में जो दिख रहा है, वो दावा नहीं, दया मांग रहा है।
यहां लोगों को आज भी बीमार परिजन को चारपाई पर कंधों पर उठाकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है।
बारिश हो या धूप, गर्मी हो या सर्दी… रास्ता नहीं बदलता, बस हालात और भी मुश्किल हो जाते हैं।
स्थानीय लोग कहते हैं —
“केवल सिंह पठानिया साहब आए थे, बोले थे – सड़क बनेगी, सुविधा आएगी… लेकिन आज तक सिर्फ बातें आईं, सड़क नहीं!”
ये वही नेता हैं, जो चुनाव के वक़्त ढलानों पर भी दौड़ते हैं,
कंधे पर बैग नहीं, वादों की झोली लेकर आते हैं।
लेकिन जब वही जनता कंधे पर बीमार लेकर चढ़ाई चढ़ रही होती है,
तब नेता जी व्यस्त होते हैं…
“हां, सरकार बदली है… चेहरे बदले हैं… लेकिन हालात वहीं के वहीं हैं।”

कहते हैं देश डिजिटल हो रहा है…
लेकिन यहां लोग आज भी जिंदगी की गारंटी सड़क से मांग रहे हैं।
सरकार और जनप्रतिनिधियों से एक सवाल है —
“कब तक हम अपने बीमारों को कंधों पर उठाते रहेंगे?
कब आएगी सड़क उस गांव में, जहां से वोट तो हर बार निकलता है, पर विकास नहीं?”
तस्वीरें चीख रही हैं…
“अब वादे नहीं, रास्ता चाहिए!”

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