यह तस्वीरें सोलन–मीनस–राजगढ़–हरिपुरधार मार्ग की हैं… जहां बियोंग गांव के पास एक पिकअप हादसे का शिकार हो गई। गनीमत रही कि इस दुर्घटना में कोई जानी नुकसान नहीं हुआ। स्थानीय लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और पिकअप को दोबारा खड़ा किया गया।लेकिन यह हादसा कोई नई घटना नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है – “कब तक किस्मत हमें बचाती रहेगी?” यह दुर्घटनाएं दरअसल टूटी-फूटी और संकरी सड़कों का नतीजा हैं।बरसात के दिनों में यह सड़क दलदल और भूस्खलन का दूसरा नाम बन जाती है। किसान अपनी मेहनत की फसल इसी रास्ते से बाजार तक ले जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे और बीमार रोगी भी हर सफर में मौत और जोखिम साथ लेकर चलते हैं।
यह सड़क सिर्फ एक मार्ग नहीं… बल्कि जीवन रेखा है। सोलन को राजगढ़, नोहराधार, हरिपुरधार, रोनहाट, शिलाई, रेणुका और संगड़ाह जैसे सैकड़ों गाँवों और कस्बों से जोड़ती है। गिरिपार क्षेत्र की कृषि और बागवानी की धड़कन – सेब, अदरक, आलू और नगदी फसलें इन्हीं रास्तों से देशभर तक पहुँचती हैं। लेकिन जर्जर सड़कों के कारण किसानों की सालभर की मेहनत अक्सर मिट्टी में मिल जाती है। पर्यटन की अपार संभावना रखने वाले इन वादियों की सबसे बड़ी बाधा भी यही सड़कें हैं। इसीलिए प्रदेश हाटी विकास मंच लगातार इस मार्ग को नेशनल हाईवे बनाने और चौड़ीकरण की माँग उठा रहा है। मंच का कहना है कि यह सिर्फ विकास की नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा और क्षेत्र की अस्मिता की माँग है। सवाल यही है…कब तक इन सड़कों पर सफर जोखिम और हादसों के साए में चलता रहेगा… कब तक इस अनदेखी की कीमत आम जनता और किसान अपनी जान से चुकाते रहेंगे?










