हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की रुपी घाटी में फुल्याच मेले का शानदार शुभारंभ हुआ, जो देवभूमि की समृद्ध लोक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत उत्सव है। स्थानीय बोली में ‘फुला का मेला’ के नाम से प्रसिद्ध यह पर्व, श्री मट्टिंग कुलदेव नारायण जी के पवित्र मंदिर प्रांगण में विधिवत पूजा-अर्चना और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हुआ। फुल्याच मेला किन्नौरी संस्कृति का एक अनमोल रत्न है, जो आस्था, सामाजिक एकता और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है। मेले के पहले दिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक रुपी घाटी में उमड़े, जहां रंग-बिरंगी देव झांकियां, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर धुनें और किन्नौरी नृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियां सभी को मंत्रमुग्ध कर गईं।
मेला समिति के अनुसार, फुल्याच मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि किन्नौर की सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने का संदेश देता है। मेले में लोकगीतों, नाटी नृत्यों और पारंपरिक खेलों का आयोजन क्षेत्र को उत्साह और उमंग से भर देता है। मंदिर प्रांगण में आयोजित पूजा-अर्चना में स्थानीय लोग और दूर-दराज से आए श्रद्धालु शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोगों ने मेले को और भी जीवंत बना दिया। पर्यटकों ने भी किन्नौरी संस्कृति की इस अनूठी झलक को कैमरों में कैद किया और स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लिया।
मेला समिति के अध्यक्ष ने बताया, “फुल्याच मेला हमारे लिए सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का माध्यम है। यह हमें प्रकृति, देवताओं और समुदाय के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।” मेले का रंग अगले कुछ दिनों तक और गहरा होगा, जिसमें पारंपरिक नृत्य, लोक संगीत और सामुदायिक आयोजनों की श्रृंखला शामिल होगी। स्थानीय कलाकारों और समूहों द्वारा प्रस्तुतियां मेले की शोभा बढ़ाएंगी। साथ ही, यह आयोजन पर्यटकों के लिए किन्नौर की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक धरोहर को करीब से जानने का सुनहरा अवसर है।फुल्याच मेला न केवल किन्नौर की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि आधुनिकता और परंपरा का मेल कैसे समाज को समृद्ध कर सकता है।










